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क्यों चाबहार नहीं छोड़ सकता भारत?: जानें अमेरिका की चेतावनियों का क्या असर, ईरान के करीब यह बंदरगाह कितना अहम

ईरान में जारी प्रदर्शनों के बीच चाबहार बंदरगाह अचानक चर्चा में क्यों आ गया है? यह बंदरगाह आखिर कहां है और यह कितना विकसित है? इसका कूटनीतिक महत्व क्या है? भारत इस बंदरगाह परियोजना में किस हद तक जुड़ा है और यहां कितना निवेश कर चुका है? इस परियोजना को पूरा करने में लगातार देरी क्यों हो रही है? आइये जानते हैं...

ईरान में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एलान किया था कि वे ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसदी का अतिरिक्त टैरिफ लगाएंगे। ट्रंप के इस एलान के बाद से ही यह चर्चाएं तेज हो गईं कि अगर अमेरिका की ओर से नए टैरिफ लागू होते हैं तो ईरान से कुछ हद तक व्यापार में जुड़े भारत पर इसका क्या असर होगा। खासकर भारत के चाबहार बंदरगाह को लेकर ईरान से सहयोग का आगे क्या होगा।

इस मुद्दे को लेकर हाल ही में भारत में सियासी सरगर्मियां भी बढ़ गईं, जब कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार चाबहार से बाहर होने की योजना बना रही है। हालांकि, विदेश मंत्रालय ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर चाबहार बंदरगाह अचानक चर्चा में क्यों आ गया है? यह बंदरगाह आखिर कहां है और यह कितना विकसित है? इसका कूटनीतिक महत्व क्या है? भारत इस बंदरगाह परियोजना में किस हद तक जुड़ा है और यहां कितना निवेश कर चुका है? इस परियोजना को पूरा करने में लगातार देरी क्यों हो रही है? आइये जानते हैं…

क्यों चर्चा में है चाबहार बंदरगाह?

बीते दिनों में कई हलकों में यह भी चर्चा हुई कि भारत आने वाले समय में अमेरिका के दबाव में चाबहार बंदरगाह योजना से बाहर भी हो सकता है। इसकी वजह ट्रंप की ओर से ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25 फीसदी के अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकियां रही हैं। दरअसल, भारत पर पहले ही अमेरिका की तरफ से कुल 50 फीसद टैरिफ लगाया जा चुका है। इसमें 25 फीसदी आयात शुल्क व्यापार के मसले पर, जबकि अतिरिक्त 25 फीसदी रूस से तेल खरीद को लेकर लागू है।

ऐसे में जब ट्रंप प्रशासन की तरफ से ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर टैरिफ का एलान किया गया तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस तक ने कहा कि भारत ने ट्रंप के दबाव में ईरान के चाबहार बंदरगाह पर नियंत्रण छोड़ दिया है। पार्टी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने चाबहार पर जनता के करीब 1100 करोड़ रुपये लगाए थे, जो कि अब बर्बाद हो चुके हैं।

हालांकि, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा कि ईरान के चाबहार पोर्ट से जुड़ी योजनाएं जारी हैं। उन्होंने साफ किया कि अमेरिका की तरफ से भारत को चाबहार के लिए अप्रैल 2026 तक की छूट दी गई है और भारत इस मुद्दे को सुलझाने के लिए आगे भी अमेरिका से लगातार बातचीत कर रहा है।

क्या है चाबहार बंदरगाह, अब तक यह कितना विकसित?
चाबहार (शाब्दिक अर्थ- चार झरने) बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित है। जिस जगह पर यह मौजूद है, वह ओमान की खाड़ी का मुहाना है, जो इसे रणनीतिक रूप से बेहद अहम बंदरगाह बनाता है। यह ईरान का पहला गहरे पानी में स्थित बंदरगाह है, जो देश को वैश्विक समुद्री व्यापार मार्ग पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाता है।
इस बंदरगाह पर भारत की भागीदारी 2002-2003 में शुरू हुई थी। मौजूदा समय में एक भारतीय कंपनी, इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल) इसके शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल का संचालन करती है। भारत ने 2024 में इसके संचालन के लिए 10 साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं और इसके विकास के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय प्रतिबद्धता दिखाई है।

हालांकि, इस बंदरगाह को अब तक पूरी तरह विकसित नहीं किया जा सका है। भारत ने इस बंदरगाह का इस्तेमाल अफगानिस्तान को मानवीय सहायता (जैसे गेहूं) भेजने के लिए एक लॉजिस्टिकल हब (रसद केंद्र) के तौर पर किया है, हालांकि परियोजना की विकास की रफ्तार काफी धीमी रही है। इसकी एक वजह यह है कि ये बंदरगाह अक्सर भू-राजनीतिक तौर पर मुश्किलों में घिरा रहा है। खासतौर पर ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से। इसके बावजूद भारत ने स्पष्ट किया है कि चाबहार से बाहर निकलना विकल्प नहीं है क्योंकि यह रणनीतिक हितों के लिए जरूरी है।

चाबहार बंदरगाह को विकसित करने में भारत की क्या भूमिका?

चाबहार बना भारत की रणनीतिक जरूरत
1996 में अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बाद भारत और ईरान के बीच सहयोग बढ़ा था, क्योंकि दोनों देश तब पाकिस्तान समर्थित इस समूह को लेकर आशंकित थे। भारत के लिए पाकिस्तान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच भी बाधित हुई थी, जिसके बाद भारत ने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए वैकल्पिक मार्ग की तलाश शुरू की।

अटल सरकार में हुई बातचीत की शुरुआत
भारत की इस बंदरगाह में भागीदारी की शुरुआत 2002 में हुई, जब ईरान के तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) हसन रूहानी ने भारतीय समकक्ष ब्रजेश मिश्रा के साथ इस पर चर्चा की। इसके बाद 2003 में राष्ट्रपति खातमी की भारत यात्रा के दौरान उन्होंने और भारत के तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने रणनीतिक सहयोग के रोडमैप पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चाबहार एक प्रमुख परियोजना थी।

मोदी सरकार में बढ़ा चाबहार को लेकर सहयोग
जनवरी 2015 में विदेश में बंदरगाहों के विकास के लिए जिम्मेदार इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड का गठन किया गया। अप्रैल 2016 में भारत, ईरान और अफगानिस्तान ने एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिससे परियोजना में तेजी आई।

2017 में भारत ने पहली बार उठाया फायदा
दिसंबर 2017 को चाबहार के शाहिद बेहेश्ती बंदरगाह के पहले चरण का उद्घाटन किया गया और भारत ने इसी वर्ष इस मार्ग से अफगानिस्तान को गेहूं की पहली खेप भेजी। इसके एक साल बाद यानी दिसंबर 2018 में आईपीजीएल ने आधिकारिक तौर पर शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के परिचालन का हिस्सा अपने हाथ में ले लिया।

2024 में हुआ टर्मिनल संचालन के लिए अनुबंध
भारत ने 2023 में इस बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान को 20 हजार टन गेहूं की खेप भिजवाई थी। इसके अलावा अफगानिस्तान में भूकंप के समय इसी बंदरगाह से काफी मदद भी पहुंचाई गई। 2024 में चाबहार में एक टर्मिनल के संचालन के लिए 10 साल के अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। भारत ने इसके विकास के लिए लगभग 12 करोड़ डॉलर के उपकरण की सहायता और 25 करोड़ डॉलर की क्रेडिट लाइन की प्रतिबद्धता जताई।

अमेरिका ने कब-कब अटकाया रोड़ा?

2003 में अमेरिका के प्रतिबंधों की मार से गुजरा चाबहार
चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत को पहली बार चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा है। इससे पहले अटल सरकार के दौरान जब भारत इस परियोजना से जुड़ा था, उसी दौरान अमेरिका ने ईरान को अपनी एक्सिस ऑफ इविल (बुराई की धुरी) वाले देशों में शामिल किया था और परोक्ष तौर पर प्रतिबंध लगा दिए थे। इससे इस परियोजना के जारी रहने में खासी दिक्कतें आईं। अगले 10 साल इस परियोजना में भारत की भूमिका काफी कम रही और यह बंदरगाह परियोजना खुद भी धीमी प्रगति से गुजरी।

2018 में भी लगने वाला था ब्रेक
जब भारत चाबहार परियोजना से पूरी तरह जुड़ते हुए इसका लाभ उठाना शुरू कर रहा था, उसी दौरान 2018 में ट्रंप प्रशासन ने ईरान और पश्चिमी देशों के बीच हुए परमाणु समझौते (JCPOA) से हटने का एलान कर दिया। इतना ही नहीं अमेरिका ने ईरान पर नए प्रतिबंधों का भी एलान कर दिया, जिसमें ईरान के साथ काम करने वाली कंपनियों और फर्म्स पर भी पाबंदियां शामिल थीं। हालांकि, भारत की ओर से चर्चा के बाद ट्रंप सरकार ने चाबहार परियोजना पर इन प्रतिबंधों से विशेष छूट दे दी थी।

2021 में भी अमेरिका की वजह से अटकी थी परियोजना
इस साल अमेरिका ने अपनी सेना को वापस बुलाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही काबुल पर एक बार फिर तालिबान सत्ता पर काबिज हो गया। नतीजा यह रहा कि शुरुआत में भारत सीधे तौर पर तालिबान से संपर्क नहीं साध पाया और इसके चलते चाबहार बंदरगाह परियोजना और अटकी रही। 2022 के बाद से भारत ने अफगानिस्तान तक पहुंच बनाने के लिए राजनयिक कोशिशें फिर शुरू कर दीं और फिर चाबहार बंदरगाह पर काम में तेजी आई।

भारत के लिए यह कितना अहम?

1. रणनीतिक पहुंच
भारत के लिए चाबहार की सबसे बड़ी अहमियत यह है कि ये पाकिस्तान से गुजरे बिना सीधे अफगानिस्तान और पश्चिम एशिया तक सीधी समुद्री पहुंच बनाने में मदद करता है।

दरअसल, अफगानिस्तान तक पहुंचने के लिए भारत लंबे समय से पाकिस्तान के जमीनी मार्ग या लंबे हवाई मार्गों पर निर्भर रहा है। तनाव के समय में पाकिस्तान की तरफ से भारत के अफगानिस्तान तक जाने वाले जमीनी और हवाई रास्तों को बाधित कर दिया जाता है। ऐसे में यह समुद्री बंदरगाह आने वाले समय में भारत के लिए पश्चिम की ओर जुड़ाव का अहम गलियारा है।

चीन-पाकिस्तान के खिलाफ अहम: यह पाकिस्तान में चीन की मदद से विकसित ग्वादर बंदरगाह के मुकाबले एक रणनीतिक संतुलन के रूप में कार्य करता है। यह भारत को उसी भौगोलिक क्षेत्र में अपनी समुद्री उपस्थिति बनाए रखने में मदद करता है। चाबहार से ग्वादर की दूरी महज 170 किमी है। ऐसे में भारत के लिए पाकिस्तान की किसी भी हरकत का जवाब देने के लिए चाबहार अहम बंदरगाह होगा।

2. व्यापार और कनेक्टिविटी
चाबहार अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का एक अहम हिस्सा है। यह मल्टी-मॉडल परिवहन प्रणाली भारत को अफगानिस्तान-ईरान के अलावा रूस और यूरोप को जोड़ने में अहम साबित हो सकती है, जिससे स्वेज नहर के पारंपरिक समुद्री मार्ग की तुलना में भारत को परिवहन के समय और लागत में काफी कमी लाने में मदद कर सकती है।

रूस और यूरोप: चाबहार बंदरगाह अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) का मुख्य हिस्सा है। यह 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मॉडल मार्ग भारत को ईरान और रूस के जरिए उत्तरी यूरोप (वाया सेंट पीटर्सबर्ग) से जोड़ता है। यह रास्ता पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग के मुकाबले परिवहन के समय को 15 दिन कम कर सकता है।

कैस्पियन सागर क्षेत्र के देश: यह परियोजना हिंद महासागर और फारस की खाड़ी को कैस्पियन सागर से जोड़ने के लिए बनाई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस गलियारे का इस्तेमाल अर्मेनिया और अजरबैजान जैसे देशों के बीच माल ढुलाई के लिए भी किया जाना प्रस्तावित है।

यूरेशिया और व्यापक क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाएं: चाबहार के जरिए भारत को उन लैंड-लॉक्ड क्षेत्रों के बाजारों तक पहुंच बना सकता है, जहां अब तक पहुंचना कठिन था, जिससे भारत की निर्यात क्षमता और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा मिलता है। इनमें मुख्य तौर पर वे यूरोपीय देश शामिल हैं, जिनके पास तट नहीं है।

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