सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना की एक महिला के प्रिवेंटिव डिटेंशन (रोकने के आदेश) आदेश को रद्द कर दिया है। महिला को 1986 के तेलंगाना कानून में खतरनाक गतिविधियों की रोकथाम के तहत ड्रग अपराध में आरोपी बताया गया था। अदालत ने स्पष्ट कहा कि केवल यह डर कि जमानत मिलने पर वह फिर से अपराध करेगी, किसी को रोकने का पर्याप्त कारण नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी कहा कि डिटेंशन आदेश में यह स्पष्ट नहीं था कि महिला के अपराध से सार्वजनिक व्यवस्था पर कैसे असर पड़ेगा और जमानत की शर्तों या पिछले मुकदमों पर ध्यान नहीं दिया गया।
कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया कि सिर्फ तीन मामूले दर्ज होने से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित नहीं होती, जब तक यह साबित न हो कि नशे का सामान सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। ऐसे में अगर महिला ने जमानत की शर्तें तोड़ी होतीं, तो उसकी जमानत रद्द करने का कानूनी रास्ता था, उसे रोकने के लिए ऐसा नहीं किया गया।
इस दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून और व्यवस्था और सार्वजनिक व्यवस्था में अंतर है और डिटेंशन आदेश में इसे ध्यान में नहीं रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने महिला की तत्काल रिहाई का आदेश दिया, तेलंगाना हाईकोर्ट के 28 अक्टूबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि भविष्य में केवल अनुमान या आशंका पर किसी को रोकना उचित नहीं होगा।

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