राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर अक्सर अक्तूबर के महीने से बढ़ने लगता है। नवंबर आते-आते यह अपने चरम पर होता है। अक्तूबर और नवंबर का महीना ऐसा समय होता है जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में खरीफ की फसलों की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जलाया जाता है।
यह माना जाता है कि पराली के जलाने से निकलने वाला धुआं दिल्ली-एनसीआर के वातावरण में आता है तो वायु प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है। सांस लेने में दिक्कत होने के साथ-साथ आंखों में जलन होने लगती है। लेकिन एक अध्ययन रिपोर्ट में यह स्याह सच सामने आया है कि दिसंबर के महीने में जब पराली के धुएं का असर बहुत कम हो जाता है, तब भी दिल्ली-एनसीआर की हवा दमघोंटू ही बनी रहती है। स्पष्ट है दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या सिर्फ पराली जलाने से नहीं है, बल्कि इसके दूसरे कारक भी हैं।

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