अदालत ने एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया है। सुनवाई के दौरान एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य डॉ. ए सेंथिल वेल की पीठ ने माना कि यह मामला पर्यावरण संरक्षण कानून, 1986 के उल्लंघन की ओर इशारा करता है।
ऐसे में मामले में पीठ ने नोएडा अथॉरिटी, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, सिंचाई विभाग, पर्यावरण विभाग और गौतम बुद्ध नगर के जिला मजिस्ट्रेट को पक्षकार बनाया है। सभी संबंधित विभागों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अगली सुनवाई से पहले हलफनामे के जरिए अपना जवाब दाखिल करें। इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल 2026 को होगी।
यह मामला 20 जनवरी 2026 को एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर दर्ज किया गया। इसमें सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता कोहरे के कारण रास्ता भटक गए और पानी से भरी गहरी खाई में गिरने से उनकी मौत हो गई, जिस स्थान पर यह हादसा हुआ था। वह जमीन पहले एक निजी मॉल परियोजना के लिए आवंटित की गई थी, लेकिन पिछले करीब दस वर्षों से वहां बारिश का पानी और आसपास की हाउसिंग सोसाइटियों का गंदा पानी जमा होता रहा, जिससे वह जगह एक बड़े तालाब में बदल गई।
जांच में यह भी सामने आया कि सिंचाई विभाग ने वर्ष 2015 में तूफानी पानी को हिंडन नदी में छोड़ने के लिए एक रेगुलेटर बनाने की योजना बनाई थी। इसके लिए 2016 में नोएडा अथॉरिटी से 13.05 लाख रुपये भी मिले, लेकिन इसके बावजूद यह योजना जमीन पर लागू नहीं हो सकी। यही नहीं, रेगुलेटर न बनने के कारण बारिश का पानी बाहर नहीं निकल पाया, जिससे इलाके में भारी जलभराव हो गया। आसपास की कई हाउसिंग सोसाइटियों के बेसमेंट तक पानी भर गया। स्थानीय लोगों ने इस स्थिति के लिए नोएडा अथॉरिटी की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया है।
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