अमेरिकी राजधानी वॉशिंगटन से वेनेजुएला की राजधानी काराकास के बीच दूरी 3300 किलोमीटर है। फिर भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आरोप लगाते हैं कि राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के शासन में वेनेजुएला के लाखों नागरिक अमेरिका में आने को मजबूर हुए हैं। वे मादुरो पर अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी का भी आरोप लगाते हैं। दोनों देशों में चल रहे टकराव के बीच चौंका देने वाला घटनाक्रम शनिवार को तब हुआ, जब अमेरिका ने वेनेजुएला पर हमला बोल दिया। यही नहीं, राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी समेत बंधक बना लिया गया। अब उन पर अमेरिका में मुकदमा चलाने की तैयारी है। अमेरिका के इस कदम को विश्लेषक कई तरह से देखते हैं। जानिए उनकी राय…
ट्रंप कहां चूक गए?
श्रीवास्तव बताते हैं कि ऐसा लगता है कि ट्रंप ने अमेरिका की पिछली गलतियों से सबक नहीं सीखे। 9/11 हमलों के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमले को जायज ठहराने की कोशिश की, लेकिन 2003 में जब जॉर्ज बुश ने इराक पर हमला किया, तो उनके इस कदम की आलोचना हुई। मकसद सद्दाम हुसैन को हटाना था। वहां व्यापक नरसंहार के कोई हथियार नहीं मिले। युद्ध में कई अमेरिकी सैनिकों की जान गई। वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका ने यही गलती की थी।
चीन के रुख पर नजर क्यों?
संजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि अमेरिका अब किस मुंह से चीन से कहेगा कि ताइवान पर हमला मत करो? वह रूस की आलोचना कैसे करेगा? जब अमेरिका ने हमला किया, तब चीन का प्रतिनिधिमंडल वेनेजुएला में ही मौजूद था। रूस इस हमले की पहले ही निंदा कर चुका है। वेनेजुएला के पास तेल का सबसे बड़ा भंडार मौजूद है। इस घटना को अमेरिका की दादागिरी ही कहेंगे। अमेरिका की मंशा साफ है। ट्रंप विश्वास के संकट को गहरा करने का काम करते हैं। होना तो यह चाहि कि वेनेजुएला की जनता तय करे कि वहां सत्ता पर कौन बैठेगा? अमेरिका को यह तय करने का अधिकार किसने दिया?
इससे क्या खतरा पैदा हो गया है?
पूर्व विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर ने न्यूज एजेंसी एएनआई से कहा कि यह ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का पहला युद्ध है। अमेरिका ने वादा किया था कि वह यूरोप के मामलों में दखल नहीं देगा, लेकिन अब यह स्थापित हो चुका है कि उसकी दखलंदाजी लातिन अमेरिका में बढ़ गई है। यह कोई लोकतंत्र के लिए संघर्ष नहीं है। यह संघर्ष तेल और खनिज पदार्थों के लिए है। ज्यादा लोगों को यह पता नहीं है कि वेनेजुएला के पास दुनिया में सबसे बड़ा तेल भंडार है। उसके पास जो भंडार है, वह सऊदी अरब से भी ज्यादा है। यह तेल भंडार 300 अरब बैरल से ज्यादा है। ट्रंप इसी वजह से वेनेजुएला पर नियंत्रण चाहते हैं। रूस और चीन यह जाहिर कर चुके हैं कि वह वेनेजुएला में अमेरिकी दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करेंगे। अगर वेनेजुएला टकराव का नया बिंदु हो जाता है, तो दुनियाभर में इसके गंभीर नतीजे देखने को मिल सकते हैं।
इस घटना से भारत को कितना फर्क पड़ेगा?
वेनेजुएला में भारत के राजदूत रहे आर विश्वनाथन ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया कि पिछली बार भी जब ट्रंप राष्ट्रपति बने थे, तब भी उन्होंने वेनेजुएला को धमकियां दी थीं, तो इस बार जो हुआ, उससे आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इस बार उन्होंने जंगी जहाज भेजे और सीआईए को जिम्मा सौंप दिया। हालांकि, इस घटना से भारत पर असर नहीं पड़ना चाहिए क्योंकि हम कच्चे तेल के लिए वेनेजुएला पर निर्भर नहीं हैं। 2013-14 में हम 10 अरब डॉलर मूल्य का कच्चा तेल वेनेजुएला से आयात कर रहे थे। तब हम हमारी जरूरत का सात-आठ फीसदी तेल वहां से ले रहे थे। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद हमारी निर्भरता वेनेजुएला पर नहीं रही है। भारतीय तेल कंपनियों का वहां पर कुछ निवेश जरूर है, लेकिन इस घटना का इस निवेश पर ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला।
ट्रंप अब और क्या चाहते हैं?
पूर्व राजदूत राजीव डोगरा ने न्यूज एजेंसी पीटीआई को बताया कि बड़ी या छोटी शक्तियां ट्रंप से अब प्रेरणा लेंगी। यह दुर्भाग्यपूर्ण होगा। चीन कल को ताइवान पर हमला कर सकता है। चीन भी यह सोचेगा कि जब अमेरिका ऐसा कर सकता है, तो हम क्यों नहीं कर सकते। लातिन अमेरिका को लेकर अमेरिकी नीतियों पर कभी भी भरोसा नहीं रहा है। हालांकि, इस पर कोई देश कुछ नहीं कर पाया क्योंकि अमेरिका महाशक्ति है। दुनियाभर में अब यह चिंताएं हैं कि अब ट्रंप का ‘एंड गेम’ क्या है? असल में ट्रंप कामयाब होते नजर आ रहे हैं। अगर ट्रंप अमेरिका को वेनेजुएला के कच्चे तेल पर नियंत्रण दिलवा देते हैं और ईरान में कुछ कर पाते हैं, जिसके लिए उनके इरादे आक्रामक हैं, तो अमेरिका और खासकर ट्रंप के परिवार के पास दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों के बड़े हिस्से का नियंत्रण आ सकता है। यह दुनिया के लिए ठीक नहीं होगा।

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