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West Asia Crisis: अंदर और बाहर सवालों से घिरे राष्ट्रपति ट्रंप, ईरान पर आखिर कितना और बम मारेंगे?

पश्चिम एशिया संकट लगातार गहरा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि ईरान और अमेरिका में कौन मानेगा हार? सवाल अब इस्राइल के भविष्य का भी है। वहीं ट्रंप के होर्मुज जलडमरूमध्य में मदद की अपील के बावजूद पांच देशों ने की ट्रंप के आह्वान की नाफरमानी कर दी है। इसके भी कई मायने निकाले जा रहे हैं। पश्चिम एशिया संकट के चलते जहां पूरी दुनिया में तेल की आपूर्ति बाधित हुई है। वहीं खाड़ी देशों की अर्थ व्यवस्था पर भी बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

90 के दशक से ‘महाबली अमेरिका’ की नाफरमानी कहां संभव थी? लेकिन पहली बार है कि राष्ट्रपति ट्रंप ने हार्मुज स्ट्रेट(जलडमरु मध्य) में अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग की निगरानी और सुरक्षा का आह्वान किया और ब्रिटेन, कोरिया, चीन, फ्रांस जापान ने प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष दोनों रूप में नौसैनिक युद्धपोत भेजने, जुड़ने से इनकार कर दिया। ऐसे में दो बड़े सवाल हैं। पहला अमेरिका ईरान पर कितना और बम गिराएगा और दूसरा कि समाधान का रास्ता क्या है?

दोनों सवाल पर भारतीय विदेश मामलों के जानकार, पूर्व राजनयिक फिलहाल चुप हैं। एक पूर्व राजनयिक कहते हैं कि हार कौन मानेगा? अमेरिका या ईरान? पीछे कौन हटेगा? बिना पीछे हटे शांति संभव नहीं है। विदेश और सामरिक मामलों के जानकार रंजीत कुमार कहते हैं कि ईरान को अमेरिका और इस्राइल के बम, मिसाइल, हमले से डर नहीं लग रहा है। पश्चिम की मीडिया भी पहले से बहुत संभल गई है। अमेरिका और इस्राइल के बयान संतुलित आ रहे हैं। ईरान आत्मरक्षा में हमले का नाम देने के बाद भी भड़काऊ बयान से दूर है। इतना ही नहीं, वह न तो शांति वार्ता की पहल करना चाहता है और न झुकने का संदेश देना चाहता है। सबसे दिलचस्प है कि अमेरिका के राष्ट्रपति लगातार ईरान के सैन्य बेस को तबाह करने की जानकारी दे रहे हैं। वह जल्द ईरान के हार मानकर बातचीत की टेबल पर आने का दावा कर रहे हैं और जवाब में ईरान जोरदार जवाबी सैन्य हमले कर रहा है।

अमेरिका और इस्राइल की मुश्किल क्या है?
28 फरवरी 2026 को ईरान पर हमले की शुरुआत अमेरिका और इस्राइल ने मिलकर की थी। पिछले साल अमेरिका केवल ईरान को डराने और इस्राइल को मजबूती देने की भूमिका में था। इस बार सीधे संयुक्त रूप से जंग में उतर गया। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार प्रमुख जान बोल्टन ने तो सवालों की झड़ी लगा दी है। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा समेत तमाम ने बड़े गंभीर सवाल उठाए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर अमेरिका का ईरान से युद्ध का उद्देश्य क्या है?

अमेरिकी रणनीतिकारों का अनुमान था कि घातक संयुक्त ऑपरेशन की तबाही देखकर ईरान घुटने टेक देगा। ईरान की जनता भी युद्ध की विभीषिका में नहीं फंसना चाहेगी और आंतरिक विद्रोह के साथ ईरान में सभी समीकरण सध जाएंगे। हालांकि ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई ने इस लड़ाई के पूरे मध्य एशिया क्षेत्र में फैलने और घातक परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी। हुआ भी यही। लड़ाई ने पूरे मध्य एशिया का जायका बिगाड़ दिया। दक्षिण एशिया की अर्थव्यस्था पर बुरा असर डाल रही है। यूरोपीय देश तंग हैं और खाड़ी देशों में पर्यटन, कारोबार, व्यापार का पहिया थम सा गया है।

पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि बात यहीं तक नहीं है। मध्य एशिया और खासकर खाड़ी देश के बड़े हिस्से में अमेरिका का दबदबा है। तेल, गैस के कारोबार में अमेरिकी कंपनिया हैं। इजरायल के सहयोग से अमेरिका लगातार पैठ बढ़ा रहा था और अब इनसभी पर खतरा मंडरा रहा है। एनबी सिंह कहते हैं कि अमेरिका को अपने साथ-साथ इजरायल की चिंता है। ईरान के इस तरह से खड़े रहने की दशा में इजरायल के लिए काफी बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाएगी।

…और कितना घातक बम मारेगा अमेरिका और इजरायल ?
ईरान से जंग चल रही है, लेकिन अमेरिका के हाथ बंधे हैं। वह ईरान खरग द्वीप(तेल, गैस के व्यापार का केन्द्र) को पूरी तरह तबाह नहीं कर सकता। मुश्किल होगी। ऐसा होने पर 40 प्रतिशत से अधिक दुनिया की आबादी ऊर्जा के संकट से जूझने लगेगी। चीन को सबसे पहले नागवार लगेगा। इसलिए अमेरिका, इजरायल केवल सैन्य ढांचे ही तहस नहस कर सकता है। ईरान के स्कूल पर बमबारी के बाद दुनिया में हो रही थू-थू से अमेरिका तंग है। ईरान के अंदरूनी हिस्से में भी यही स्थिति है। अमेरिका और इजरायल के रणनीतिकार अपने घातक हमलों से कभी भी ईरान जनता की नाराजगी नहीं मोल लेना चाहेंगे। ऐसे मुश्किल समय में अभी तक ईरान की जनता युद्ध को लेकर न तो प्रदर्शन कर रही है और न विद्रोह। दूसरे घातक रसायनिक हथियार और संक्षिप्त परमाणु हथियार के प्रयोग की आंच खाड़ी देशों तक भी जाएगी। रेडियेशन से दूसरे देश भी प्रभावित होंगे। ऐसे में अमेरिका के पास ईरान के सैन्य और प्रशासनिक  ढांचे को तहस-नहस करने का ही चारा है।

क्यों नहीं थम रहे हैं ईरान के हमले?
ईरान की सारी खूबी उसकी रणनीति, तैयारी, हथियार, मारक क्षमता से कहीं ज्यादा उसकी भौगोलिक स्थिति है। उसका खरग द्वीप गहरे समुद्र में है। जिसमें दुनिया भर के भारीभरकम जहाज, टैंकर आकर तेल, गैस आदि समुद्र की गहराई के कारण आसानी से भरते हैं और चले जाते हैं। इस द्वीप पर ईरान से तेल, गैस आदि की पाइप लाइन आती है। ईरान के उत्तर में कैस्पियन सागर है। सागर के उसपार तुर्कमेनिस्तान, रूस की सीमा शुरू हो जाती है। पूर्व में पाकिस्तान, अफगानिस्तान हैं। उत्तर पश्चिम में  अजरबैजान, आर्मेनिया हैं। पश्चिम में इराक, तुर्की। दक्षिण में फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब की सीमाएं।इस तरह से साथ देशों की जमीनी सीमा जुड़ती हैं। अब आइए ईरान के कवच(पहाड़) की बात करते हैं। ईरान का दामवंद पर्वत की चोटी 5610 मीटर ऊंची है। ईरान के केन्द्र में कई बंद बेसिन(मध्य पठार) हैं। यह पठार समुद्र तल से करीब 800-900 मीटर ऊंचे हैं। 3000 हजार मीटर ऊंची पर्वत श्रंखला है और इसके नीचे ईरान ने बड़े सुनियोजित तरीके से अपनी सुरक्षित दुनिया बना रखी है। दश्त-ए कवीर और दश्त-एलुत रेगिस्तान भी। माना जाता है कि इन्हें भेद पाना अमेरिका और इजरायल के लिए आसान नहीं है।

ईरान के सहयोगी भी नहीं हट रहे हैं पीछे
रूस और चीन भले ही अमेरिका इजरायल की जंग में ईरान का खुला साथ न दे रहे हों, लोकिन तकनीकी और सूचना साझेदारी में सहयोग कर रहे हैं। इस तरह के आरोप अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप भी लगा चुके हैं। इसके अलावा इजरायल को तंग करने के लिए लेबनान का हिज्बुल्ला संगठन लगातार हमले कर रहा है। हूती संगठन ने रेड सी ब्लॉक कर रखा है। ड्रोन, हाइपरसोनिक मिसाइल, क्लस्टर बम की तकनीक, समुद्र के भीतर मार करने वाले ड्रोन आदि की सहायता से ईरान ने स्टेट ऑफ हार्मुज को पूरी तरह से ब्लॉक कर रखा है। उसके बड़ी संख्या में सस्ते ड्रोन अमेरिका और इजरायल की मंहगी हथियार प्रणाली को थकाने के लिए काफी हैं। जवाब में ईरान की घातक मिसाइलों और हथियारों ने इजरायल में दहशत फैला रखी है। अमेरिकी सैन्य अड्डे असुरक्षित हो चले हैं। इतना ही नहीं अमेरिका के विमान वाहक पोत भी खतरे की जद को भांपते हुए सुरक्षित क्षेत्र की तरफ रुख कर लिया है।

बड़ी तैयारी से ईरान ने बढ़ाया अमेरिका पर दबाव
ईरान ने जंग में केवल अमेरिका और ईरान को दुश्मन बनाया है। अमेरिका और इजरायल का साथ देने वाले देशों को चेतावनी दी और संकेतिक से कुछ घातक ड्रोन हमले किए हैं। स्टेट ऑफ हार्मुज(अर्थ व्यवस्था के रूट) को ब्लॉक कर दिया है। इसके अलावा आस-पास के जिन जिन देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, वहां हमला कर उन्हें खाली करने या दहशत पैदा करने की कोशिश की है। इजरायल में अपनी घातक मिसाइल और ड्रोन हमले से स्पष्ट संकेत दे दिया कि वह हमला कर तबाही ला सकता है। रोकना मुश्किल। ईरान की इस कोशिश से अरब देशों के व्यापार, कारोबार को तगड़ा झटका लग रहा है। अमेरिकी कंपनियों का घाटा हो रहा है। व्यापार मार्ग बाधित होने से दुनिया के देशों की सप्लाई चैन, आयात-निर्यात अटका सा पड़ा है। ईरान संकेत दे रहा है कि वह लंबे समय तक हमले झेल सकता है। हमला करता रहेगा। झुकेगा नहीं। डरेगा नहीं। ईरान के इस हौसले और रणनीति के दबाव में अमेरिका के माथे पर शिकन है।

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