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World Water Day: पराए पानी पर जी रही राजधानी, उधारी से बुझ रही दिल्ली की प्यास; गर्मी से पहले ही पेयजल संकट

गर्मी से बेशक अभी आपका गला सूख नहीं रहा हो, लेकिन दिल्ली की बड़ी आबादी पेयजल संकट से घिरी है। तमाम कालोनियां की रात पानी के इंतजार में काली हो रही है। अप्रैल आते-आते पानी-पानी का शोर जोर से उठेगा और मामला कई इलाकों में झगड़ा और मारपीट तक पहुंच जाएगा। चटकती गर्मी में हर साल यही होता आया है। ऐसा नहीं है वजह से जिम्मेदार अंजान है लेकिन अनदेखी इस कदर है कि जल स्रोत सूखते जा रहे हैं और भूजल परत दर परत नीचे खिसक रहा है...

राजधानी में एक के बाद एक करके कुएं, तालाब, झीलें सूखतीं चली गई लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। भूजल संचयन से कई गुना ज्यादा दोहन हो रहा है। ऐसे में धरती के पेट का पानी लगतार कम होता जा रहा है। दिल्ली कच्चे पानी के लिए सबसे ज्यादा यमुना नदी पर निर्भर है जिस पर पहले से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, यूपी और हरियाणा की प्यास बुझाने का बोझ है।

स्थानीय वर्षाजल का योगदान सीमित है, जबकि भूजल का दोहन नियंत्रित स्तर पर किया जाता है। ऐसे में कच्चे पानी की मात्रा में उतार-चढ़ाव शोधन संयंत्रों की उत्पादन क्षमता को प्रभावित करता है राजधानी के वजीराबाद और चंद्रावल संयंत्रों को यमुना से कच्चा पानी प्राप्त होता है। यमुना से मिलने वाला पानी दिल्ली के कुल पेयजल उत्पादन का बड़ा हिस्सा है।

गंगा का पानी अपर गंगा नहर के माध्यम से दिल्ली लाया जाता है, जिससे सोनिया विहार और भागीरथी संयंत्रों को आपूर्ति होती है। हरियाणा से आने वाली मुनक नहर और दिल्ली सब-ब्रांच नहर के जरिये भी कच्चा पानी राजधानी तक पहुंचता है। भाखड़ा स्टोरेज से मिलने वाला पानी हैदरपुर, द्वारका और नांगलोई संयंत्रों के माध्यम से शोधन के बाद वितरित किया जाता है।

इसके अलावा दिल्ली के विभिन्न इलाकों में स्थापित ट्यूबवेल और रैनी वेल से भूजल भी निकाला जाता है, जो कुल आपूर्ति में सहायक भूमिका निभाता है। साफ है कि दिल्ली अपने पेयजल के लिए काफी हद तक हरियाणा और उत्तर प्रदेश पर निर्भर है। यमुना और गंगा बेसिन से आने वाला पानी ही राजधानी की जलापूर्ति की रीढ़ है।

किस जिले में पानी का कितना दोहन
2024 में सीजीडब्ल्यूबी की तरफ से प्रकाशित भारत के गतिशील भूजल संसाधनों पर राष्ट्रीय संकलन 2024 के अनुसार, दिल्ली में रिचार्ज से कई गुना अधिक पानी निकाला जा रहा है, जो भूजल संकट की तरफ इशारा करता है। दिल्ली का भूजल विकास स्तर 91 फीसदी है जो दर्शाता है कि दिल्ली का भूजल स्तर खतरे में है। 41.49 फीसदी क्षेत्र अति-दोहन की श्रेणी में है। पूर्वी दिल्ली में 98, नई दिल्ली में 135 और उत्तर पूर्वी दिल्ली 108 प्रतिशत अति-दोहन की श्रेणी में हैं, जबकि मध्य दिल्ली में 81, दक्षिण दिल्ली में 112 और दक्षिण पश्चिम दिल्ली 94 फीसदी गंभीर श्रेणी में है।

अवैध बोरवेल पर एनजीटी सख्त
नई दिल्ली। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने दिल्ली के पीतमपुरा इलाके में अवैध बोरवेल संचालन को गंभीरता से लिया है। यह मामला वरुण लूथरा की याचिका से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान बताया गया कि मोरया एन्क्लेव क्षेत्र में बिना अनुमति के बोरवेल से भूजल दोहन किया जा रहा है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) ने कार्रवाई के लिए संबंधित विभागों से जवाब मांगा था, लेकिन दिल्ली जल बोर्ड और अन्य अधिकारी समय पर प्रतिक्रिया नहीं दे पाए।

एनजीटी ने इस लापरवाही पर चिंता जताई और कहा कि बोरवेल की वैधता की ठीक से जांच नहीं की गई। दिल्ली जल बोर्ड ने भरोसा दिया है कि दोबारा जांच कर सच्चाई सामने लाई जाएगी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि शिकायत करने पर उसे धमकियां मिल रही हैं। अधिकरण ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि जरूरत पड़ने पर शिकायतकर्ता को सुरक्षा दी जाए। अगली सुनवाई 6 जुलाई को होगी।

गर्मी में यमुना में हो जाता पानी कम
यमुना से मिलने वाले पानी की मात्रा पर भी मौसम प्रभाव पड़ता है। नदी में प्रवाह कम होने या हरियाणा से कम पानी छोड़ने की स्थिति में वजीराबाद और चंद्रावल संयंत्रों की क्षमता प्रभावित होती है। नहरों के माध्यम से आने वाले पानी में कमी का असर सोनिया विहार या भागीरथी संयंत्रों पर पड़ता है। दरअसल, दिल्ली का अपना कोई बड़ा जलाशय नहीं है, इसलिए भंडारण क्षमता सीमित है। ऐसे शहर रोजाना मिलने वाले कच्चे पानी पर निर्भर है।

दिल्ली को दो बड़ी नदियों, यमुना और गंगा का पानी मिलता है। फिर भी, देश की राजधानी बेपानी है। इसे पेयजल से परिपूर्ण बनाने के लिए सरकार के पास कोई नीति नहीं है। बारिश का पानी बर्बाद हो जाता है। पहले जिन तालाबों, बावड़ियाें, कुंओं में पानी रुकता था, आज वहां अतिक्रमण है। दिल्ली का सबसे बड़ा वाटर बैंक अरावली बेजान पड़ा है। सरकार अगर दिल्ली को पेयजल संकट से उबारना चाहती है तो स्थानीय स्रोतों पर काम करना पड़ेगा। अगर बारिश का पानी ही बचा लिया जाए तो काफी हद तक समस्या का समाधन हो जाएगा। बड़े और दिखावटी प्रोजेक्ट की जगह छोटे-छोटे, विकेंद्रित प्रोजेक्ट से पानी बचाने की कोशिश करनी होगी।
– जल पुरुष राजेंद्र सिंह

मांग और उत्पादन में अंतर
गर्मियों में ही नहीं, सर्दी, बारिश में भी शहर के कई हिस्से टैंकर से पानी लेते हैं। इसकी वजह पानी की बढ़ती मांग और उत्पादन में भारी अंतर है। बढ़ती आबादी, अनियमित कॉलोनियों का विस्तार और वितरण नेटवर्क की सीमाओं के बीच उपलब्ध पानी पर्याप्त नहीं है। यही वजह है कि गर्मियों में मांग बढ़ने पर पानी लेने की कोशिश मारपीट, हत्या तक हो चुकी हैं। सभी स्रोतों को जोड़कर देखा जाए तो राजधानी में उपलब्ध कुल पेयजल उत्पादन सामान्य परिस्थितियों में 900 से 1000 एमजीडी यानी लगभग 341 से 379 करोड़ लीटर प्रतिदिन के बीच रहता है। दिल्ली की जरूरत इससे काफी अधिक है। दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण के साथ दूसरी रिसर्च बताती हैं कि दिल्ली की वर्तमान पानी की मांग लगभग 1,250 से 1,290 एमजीडी है। इसका अर्थ है कि रोजाना औसतन 250 से 350 एमजीडी तक की कमी है। यही अंतर अनियमित आपूर्ति और टैंकर निर्भरता के रूप में दिखाई देता है।

आपूर्ति का पैटर्न भी असमान…
नई दिल्ली और योजनाबद्ध कॉलोनियों में अपेक्षाकृत बेहतर आपूर्ति होती है, जबकि बाहरी-घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पानी का दबाव कम रहता है। कई जगहों पर सुबह-शाम निर्धारित समय में ही पानी छोड़ा जाता है। यदि किसी दिन कच्चे पानी की मात्रा कम हो जाए या किसी संयंत्र में तकनीकी कारणों से उत्पादन घटे, तो उसका सीधा असर आपूर्ति पर पड़ता है।

आबादी, मांग बढ़ रही लगातार
दिल्ली की आबादी लगातार बढ़ रही है। विभिन्न अनुमानों के अनुसार, राजधानी की जनसंख्या दो करोड़ से अधिक हो चुकी है। यदि प्रति व्यक्ति 50 से 60 गैलन प्रतिदिन की मानक जरूरत के आधार पर गणना की जाए तो कुल जरूरत 1,250 एमजीडी से ऊपर बैठती है। कई इलाकों में लोगों को निर्धारित समय पर सीमित अवधि के लिए ही पानी मिलता है।

वर्षा जल संचयन की स्थिति
केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय को प्रेषित दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति की मई 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली जल बोर्ड वर्षा जल संचयन सिस्टम लगवाने में पिछड़ रहा है। कुल 9,172 में अब तक 7,599 स्पाट पर यह सिस्टम लग पाया है। पहले से लगे 720 सिस्टम या तो खराब हो चुके हैं अथवा उपयोग के काबिल नहीं बचे। बीते 20 वर्षों में दिल्ली में भूजल स्तर 20 मीटर तक नीचे जा चुका है। डीजेबी और एनजीटी की रिपोर्ट बताती हैं कि 2020-25 तक दिल्ली में वर्षा जल संचयन की स्थिति भी दयनीय रही है।

मानक पर खरा नहीं पेयजल
राजधानी में हर घर तक साफ और पीने योग्य पानी नहीं पहुंच रहा है। एमसीडी की लगातार सामने आने वाली जांच रिपोर्ट में इसका खुलासा हो चुका है। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली जल बोर्ड की ओर से सप्लाई किए जा रहे पानी के करीब 20 प्रतिशत नमूने मानकों पर खरे नहीं मिलते हैं। एमसीडी के पिछले आंकड़ों के अनुसार एक अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 के बीच 2255 पानी के नमूने लिए गए। इनमें से 409 नमूने निम्न गुणवत्ता के पाए गए। यह कुल नमूनों का लगभग 18 प्रतिशत है। ये आंकड़े सामने आने के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखा। एक अप्रैल से 30 जून 2025 तक 870 नमूनों की जांच की गई, जिनमें से 174 नमूने फेल पाए गए। यानी करीब 20 प्रतिशत पानी निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरा।

नौ संयंत्र उपलब्ध कराते है पानी
राजधानी में पेयजल आपूर्ति दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) देखता है। नौ प्रमुख जल शोधन संयंत्र के जरिये कच्चे पानी को शुद्ध कर पाइपलाइन के जरिये घरों तक पहुंचाया जाता है। कुल क्षमता करीब 100 करोड़ गैलन (1000 एमजीडी) प्रति दिन है। हर दिन इतनी मात्रा में मिलता नहीं है।

प्रमुख जल शोधन संयंत्र
सोनिया विहार, भागीरथी, चंद्रावल, वजीराबाद, हैदरपुर, नांगलोई, ओखला, बवाना और द्वारका संयंत्र शामिल हैं। 

  • सोनिया विहार संयंत्र की क्षमता 140 एमजीडी यह गंगा नहर से आने वाले पानी का शोधन करता है
  • भागीरथी संयंत्र की क्षमता करीब 100 एमजीडी है
  • चंद्रावल संयंत्र की क्षमता करीब 95 एमजीडी है
  • वजीराबाद परिसर में संचालित तीन इकाइयों की संयुक्त क्षमता लगभग 123 एमजीडी है
  • हैदरपुर संयंत्र की कुल क्षमता 210 एमजीडी के करीब
  • नांगलोई संयंत्र की क्षमता लगभग 40 एमजीडी है
  • ओखला की क्षमता 20 एमजीडी
  • बवाना संयंत्र की क्षमता 20 एमजीडी
  • द्वारका संयंत्र की क्षमता 50 एमजीडी

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