पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब सीधे पाकिस्तान की आम जनता पर दिखने लगा है। देश में एलपीजी की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है, जिससे घरेलू बजट और परिवहन खर्च दोनों पर दबाव बढ़ गया है।
कीमतों में इस बढ़ोतरी का सीधा असर परिवहन क्षेत्र पर भी पड़ा है। एलपीजी से चलने वाले रिक्शा, बस और मिनीबस के किराए बढ़ गए हैं, जिससे रोजाना यात्रा करने वाले निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, इस तेजी के पीछे वैश्विक कारण प्रमुख हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतें बढ़ी हैं। इसके अलावा ईद और नौरोज के दौरान ईरान से आने वाली गैस सप्लाई में भी गिरावट आई है, जो पहले 10,000 से 12,000 टन प्रतिदिन थी।
पाकिस्तान की कुल एलपीजी जरूरत लगभग 20 लाख टन सालाना है, जिसमें से करीब 12 लाख टन आयात करना पड़ता है, जबकि 8 लाख टन घरेलू उत्पादन से पूरा होता है। मार्च में तीन जहाजों के जरिए लगभग 20,000 टन एलपीजी की आपूर्ति हुई, लेकिन यह मांग के मुकाबले काफी कम साबित हुई।
ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के पास कच्चे तेल का भंडार केवल 11 दिनों के लिए पर्याप्त है। इसके अलावा डीजल 21 दिन, पेट्रोल 27 दिन, एलपीजी महज 9 दिन और जेट फ्यूल 14 दिन तक ही उपलब्ध है।
पाकिस्तान अपनी करीब 70 प्रतिशत पेट्रोलियम जरूरतों के लिए मध्य पूर्व पर निर्भर है। ऐसे में क्षेत्रीय संघर्ष के कारण शिपिंग रूट और सप्लाई चेन प्रभावित होने से संकट और गहरा गया है।
स्थिति से निपटने के लिए सरकार ईरान के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते तेल आपूर्ति की अनुमति पर बातचीत कर रही है। हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर एलएनजी आपूर्ति में बाधा जारी रही, तो 14 अप्रैल के बाद देश को गंभीर गैस संकट का सामना करना पड़ सकता है।

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